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आलोचना किसे कहते हैं। अर्थ परिभाषा एवं विशेषताएं (aalochana kise kahate Hain. Arth paribhasha avam visheshtaen in Hindi)

 आलोचना किसे कहते हैं। अर्थ परिभाषा एवं विशेषताएं (aalochana kise kahate Hain. Arth paribhasha avam visheshtaen in Hindi)

नमस्कार दोस्तों हमारी वेबसाइट पर आप लोग का बहुत-बहुत स्वागत है आज हम आप लोगों के साथ स्टडी से जुड़ा हुआ एक पोस्ट लेकर आए हैं जो हिंदी गद्य साहित्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है की आलोचना किसे कहते हैं आलोचना एक हिंदी गद्य साहित्य की एक प्रमुख विधा है जो विवेचन या समीक्षा के नाम से जाना जाता है। आज की पोस्ट में हम आलोचना के बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त करेंगे अतः आलोचना से जुड़े हुए अनेक प्रश्न जैसे आलोचना किसे कहते हैं ?आलोचना का अर्थ क्या होता है? तथा आलोचना की परिभाषा क्या है? इत्यादि सभी प्रकार के प्रश्नों के उत्तर आपको इस पोस्ट में मिल जाएंगे जिसके द्वारा आप अपनी ज्ञान में वृद्धि करने में सक्षम हो सकते हैं।

आलोचना किसे कहते हैं aalochana kise kahate Hain

आलोचना हिंदी गद्य साहित्य की एक विधा का नाम है। जिस प्रकार से जीवनी,आत्मकथा रिपोर्ताज, रेखा चित्र ,कहानी, संस्मरण इत्यादि विधाएं होती है ठीक उसी प्रकार आलोचना भी एक हिंदी गद्य साहित्य की विधा है जिसमें किसी भी विषय को बड़ी ही बारीकी से देख कर उसकी  समीक्षा की जाती है तथा उस समीक्षा के द्वारा निकलने वाली निष्कर्ष को विधिवत लिखा जाता है। हिंदी साहित्य में आलोचना विधा का विकास भारतेंदु युग से प्रारंभ हुआ था।

आलोचना का अर्थ meaning of aalochana

आलोचना शब्द की उत्पत्ति लूच धातु से हुई है। जिसका अर्थ होता है देखना निरखना या परखना। आलोचना शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है कि किसी व्यक्ति के द्वारा किसी अन्य व्यक्ति की बुराई करना या गुणों में दोष निकालना। परंतु हिंदी साहित्य में इसका एक प्रमुख स्थान दिया गया है जो एक विधा का नाम दिया जाता है। आलोचना के अंतर्गत किसी लेखक द्वारा बड़ी ही बारीकी से किसी भी कहानी अथवा घटना का बड़ी बारीकी से विवेचन किया जाता है जिसके द्वारा उस कहानी अथवा घटना के विवेचन करने से लेखक के मन में एक विचार प्रकट होता है उस स्वच्छंद विचार को लेखक अपने शब्दों में प्रस्तुत करता है जिसे आलोचना विधा का नाम दिया जाता है।

आलोचना की परिभाषा definition of alochana

भारतेंदु हरिश्चंद्र के अनुसार-“आलोचना हिंदी गद्य रचना की व्याख्या की भी व्याख्या का नाम होता है।”
बाबु श्यामसुंदरदास के अनुसार-“साहित्य क्षेत्र में ग्रंथ को पढकर उसके गुणों और दोषों का विवेचन करना और उस संबंध में अपना मत प्रकट करना आलोचना है।”
आचार्य नंददुलारे वाजपेयी के अनुसार-
“सत्यम शिवं, सुंदरम् का समुचित अन्वेषण, पृथक्करण, अभिव्यंजना ही आलोचना है।”
डॉ. भगीरथ मिश्र के अनुसार-
“आलोचन का कार्य कवि और उसकी कृति का यथार्थ मूल्य प्रकट करना है।”
आई.ए.रिचर्ड्स के अनुसार- आलोचना हिंदी साहित्य की अनुभूतियों के विवेकपूर्ण विवेचन के उपरांत उनका मूल्यांकन करती है।
मैथ्यु अर्नाल्ड के अनुसार- वास्तविक आलोचना में यह गुण रहा करता है कि उसमें समग्र निष्पक्षता से बौद्धिक सामर्थ्य का प्रदर्शन किया जाए।
हिंदी गद्य साहित्य में जब कोई लेखक अन्य किसी लेखक के रचना को पढ़कर उनमें गुण अथवा दोषों को निकालकर एक अलग रचना करता है तो उसे आलोचना कहा जाता है। इस प्रकार से आलोचना एक प्रकार की हिंदी साहित्य की ऐसी विधा है जिसमें किसी अन्य व्यक्ति के रचना का विवेचन किया जाता है तथा अपने विचारों के आधार पर लेख लिखा जाता है जो आलोचना कहलाता है।

आलोचना की विशेषताएं (features of alochana)

आलोचना हिंदी गद्य साहित्य की एक विधा का नाम है जिस हिंदी पढ़ने वाले किसी भी व्यक्ति को भली भांति से यह पता होता है। आलोचना कुछ विशेषताएं निम्नलिखित हैं।

1-निष्पक्ष रचना

आलोचना की सबसे प्रमुख विशेषताएं होती है कि यह किसी अभिव्यक्ति के पक्ष में नहीं होता है क्योंकि लेखक किसी अन्य व्यक्ति के रचना को पढ़कर उसका विवेचन करता है तथा उस विवेचन के द्वारा प्राप्त निष्कर्ष को अपने लेख में प्रस्तुत करता है जिसमें सिर्फ लेखक के विचार निहित होते हैं। उसमें किसी अन्य व्यक्ति की रचनाओं का मिलावट नहीं किया जाता है।

2-विस्तृत व्याख्या

आलोचना किसी अन्य रचना की एक विस्तृत व्याख्या है क्योंकि जब कोई लेखक किसी अन्य लेखक के रचना को पढ़कर उनमें छोटी-बड़ी सभी बातों का विवेचना करता है उसके पश्चात जो भी स्पष्ट अर्थ निकलता है उसके बारे में वह पूरी जानकारी प्रस्तुत करता है इसलिए आलोचना को व्याख्या का भी व्याख्या कहा जा सकता है।

कुछ प्रमुख आलोचकों के नाम

हिंदी साहित्य में आलोचना एक ऐसी विधा है जिसके द्वारा किसी भी रचना को बड़ी ही सूक्ष्म दृष्टि से उसका निरीक्षण किया जाता है उसके पश्चात लेखक के मन में जिस प्रकार के विकार उत्पन्न होते हैं उसकी वीकार को रचना के माध्यम से स्पष्ट करना ही आलोचना कहलाता है। कुछ प्रमुख आलोचकों के नाम निम्नलिखित है।
  • भारतेंदु हरिश्चंद्र
  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल
  • आचार्य नंददुलारे वाजपेई
  • बाबू गुलाब राय
  • आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी
  • डॉ श्याम सुंदर दास
  • डॉ रामविलास शर्मा
  • डॉ नागेंद्र

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