Social

जाति व्यवस्था किसे कहते हैं।(what is the cast sistam .in Hindi)

 जाति व्यवस्था किसे कहते हैं (what is the caste system in Hindi)

नमस्कार दोस्तों आप लोगों का हमारे वेबसाइट बहुत-बहुत स्वागत है। आज के पोस्ट में हम ऐसे टॉपिक पर बात करेंगे जो सभी के जीवन से जुड़ा हुआ है और वह है कि जाति व्यवस्था क्या होता है। दोस्तों जाति प्रथा एक ऐसी व्यवस्था जिसके द्वारा प्रत्येक मनुष्य का कार्य करने का तरीका और रहने तथा बोलने चालने के तरीक़े को सुव्यवस्थित ढंग से चलाने का कार्य करता है।
जाति प्रथा के द्वारा व्यक्ति अपने जीवन यापन के लिए अपने परंपरागत कार्य को ही चुनता है। दोस्तों जाति का महत्व हमारे समाज में लगभग 3000 वर्ष पूर्व से ही है। परंतु जब अंग्रेज लोग भारत पर राज करने लगे तो अंग्रेजों ने जाति प्रथा के महत्व को बहुत अधिक बढ़ावा दे दिया। क्योंकि जाति प्रथा के द्वारा समाज में विघटन पैदा होता है जिससे समाज में एकता का अभाव होने लग जाता है। और समाज कई समूहों में विभक्त हो जाता है। जिसके कारण वह अपने मंसूबों में कामयाब हो सके। और आज के समय में भारत में लगभग 2000 जातियां हो गई हैं।

जाति प्रथा की विशेषताएं(carectr itics of cast system)

जाति प्रथा की कुछ अपनी मुख्य विशेषताएं हैं जो निम्न प्रकार से हैं।

1-अंतरजातीय खानपान(intererical food)

दोस्तों आप लोगों ने देखा होगा कि जाति व्यवस्था में लोग अधिकतर अपने ही जातियों में खाना खाते हैं। वह किसी अन्य जाति के घर पर अथवा किसी अन्य जाति के हाथ से परोसा हुआ भोजन नहीं करते हैं। यह जाति व्यवस्था की एक प्रमुख विशेषता है। भारतीय समाज में अगर कोई ब्राह्मण खाना खा रहा हो और उनके बीच कोई निम्न जाति का व्यक्ति खाना खाने बैठ जाए तो वह ब्राम्हण बिना खाना खाए ही उठ कर चला जाता था। परंतु समय के अनुसार धीरे-धीरे इस  छुआछूत के विचार में परिवर्तन आने लग गया और लोगों के मन में धीरे-धीरे यह विचार जागृत होने लग गया कि या गलत है क्योंकि सभी जाति के लोग इंसान ही हैं उनके साथ ऐसा निम्न व्यवहार करना बहुत ही गलत है। ईश्वर ने हम सभी को एक इंसान बना कर भेजा है परंतु हम यहां जाति का बंटवारा करके अपने आप ही उच्च और निम्न छुआछूत की भावना को मन में बैठा के रखते हैं।अतः हमें एक दूसरे के साथ मिलकर रहना चाहिए। और एक दूसरे के सुख दुख में भागीदार होना चाहिए।

2-परंपरागत व्यवसाय(traditional business)

दोस्तों आपने देखा होगा कि लोगों का व्यवसाय भी जातियों के आधार पर ही विभाजित हुए है। ब्राह्मण का कर्म धर्म करना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, पूजा पाठ करना, ज्ञान देना, ज्ञान लेना और लोगों को सन्मार्ग दिखाना होता था। क्षत्रिय का कर्म होता था अपने प्रजा का पालन पोषण करना ,उनकी रक्षा करना और पिता की तरह अपने प्रजा पर कृपा दृष्टि बनाए रखना। यदि कोई दूसरे देश का व्यक्ति प्रजा को प्रताड़ित करता है तो अपने मजबूत भुजाओं के द्वारा अपने प्रजा की रक्षा करना उनकी ढाल बनकर हमेशा उनके सामने खड़े रहना होता था। परंतु धीरे-धीरे समय के बदलाव के साथ साथ क्षत्रियों का अस्तित्व समाप्त होता चला गया और अंग्रेजों का शासन हुआ उसके बाद में प्रजातंत्र राज हो गया। इसी तरह वैश्य का काम भी अलग था इनका काम था लोगों का भरण पोषण करना एक जगह से दूसरी जगह व्यापार करके अपने देश अथवा राज्य के लोगों को सभी सामान को समुचित ढंग से लोगों को देना होता था। और इसी व्यापार के द्वारा उनका भी जीवन यापन चलता रहता था इस तरह से वैश्य लोगों का काम व्यापार ही होता था।अब आपको बता दें की सूद्र का काम इन तीनों जातियों कि सेवा करना होता था। इनका पीढ़ी दर पीढ़ी के लोग राजा के यहां रहकर सेवा करते थे।परंतु आधुनिक युग में यह बहुत काफी बदल चुका है।अब कोई भी मनुष्य इन परंपरागत व्यवसाय को नहीं स्वीकार करता है।अब लोग पढ़ लिखकर अपना व्यवसाय खुद चुनते है।

3-अंतरजातीय विवाह(interarical marriage)

जाति प्रथा की सबसे बड़ी विशेषता यह है की लोग अपने ही जातियों में विवाह करते हैं। अन्य जातियों में विवाह करना समाज उसे मान्यता नहीं देता है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग अपने मनमर्जी के हिसाब से किसी दूसरे जाति के लड़की या लड़के से विवाह कर लेते हैं तो उनके जातियों के लोग उस व्यक्ति से रूठ जाते हैं। उसके घर खानपान और अन्य संबंध छोड़ देते हैं। उस व्यक्ति को अपनी जाति में बैठने की मान्यता खत्म कर दी जाती है। परंतु आजकल के आधुनिक युग में धीरे धीरे अंतरजातीय विवाह खत्म होता जा रहा है। परंतु फिर भी भारत में अभी 90% लोग अपने ही जातियों में विवाह करते हैं 10% लोग ही होंगे जो प्यार मोहब्बत के चक्कर में अन्य जातियों में विवाह कर लेते हैं।

4-ऊंच-नीच की भावना(feeling of high and low)

जाति व्यवस्था की सबसे प्रमुख विशेषता यह होती है कि इसमें ऊंच-नीच की भावना काफी मात्रा में पाई जाती है। जाति व्यवस्था में उच्च जाति का व्यक्ति अपने से निम्न जाति के लोगों के प्रति अच्छा व्यवहार नहीं करता है। उससे एक निम्न दृष्टि से देखता है जिसके कारण समाज में ऊंच-नीच की भावनाओं का विकास होता है।

5-स्थाई होती है(permanently)

जाति व्यवस्था एक ऐसी व्यवस्था है जो स्थाई प्रवृत्ति की होती है और यह जन्म पर ही आधारित होती है कोई भी मनुष्य अपनी जाति को बदल नहीं सकता है क्योंकि उसके जन्म लेते ही उसकी जाति का निर्धारण हो चुका होता है। वह अपनी मर्जी से जाति का परिवर्तन नहीं कर सकता है इसलिए जात एक स्थाई व्यवस्था है।

6 -जन्मजात होती है(is Born)

जाति व्यवस्था का निर्धारण उसके जन्म के आधार पर ही होता है ना कि उसके कार्य पर। जब कोई पुरुष जन्म लेता है दो उसकी जाति निश्चित हो जाती है कि यह ब्राह्मण है क्षत्रिय है शूद्र वैश्य आदि है। यह जाति व्यवस्था मनुष्य चाह कर भी परिवर्तित नहीं कर सकता है। क्योंकि जाति का परिवर्तन करना एक बहुत बड़ा सामाजिक अपराध माना जाता है।

जाति व्यवस्था के गुण(profit of caste system)

जाति व्यवस्था के अनेक गुण पाए जाते हैं जो निम्न प्रकार से हैं।

1-प्रतिबंधित व्यवस्था(restricted system)

जाति व्यवस्था में जाति के प्रत्येक व्यक्ति एक नियम अथवा विधान के अनुसार ही कार्य करते हैं जो उनकी जातियों के लोगों के द्वारा बनाया जाता है। जाति के लोग उस विधान का उल्लंघन नहीं करते हैं क्योंकि उनके मन में डर बना हुआ रहता है कि यदि हम इस विधान का उल्लंघन करेंगे तो हमें जाति से निष्कासित कर दिया जाएगा। और हमारे व्यक्तित्व पर दाग लग जाएगा। जिसके कारण लोग उस व्यवस्था के तहत ही कार्य करते हैं और इससे सामाजिक व्यवस्था बरकरार रहती हैं।

2-रोजगार खोजने में आसानी(easy way of finding employment)

जाति व्यवस्था के तहत मनुष्य का व्यवसाय और कार्य उनकी जातियों के आधार पर ही निर्धारित वह होता है जिसके कारण रोजगार तलाशने की जरूरत नहीं पड़ती है और वह युवा होते हैं उस कार्य में काफी महारत हासिल कर लेते हैं। जैसे यदि कोई ब्राम्हण जाति का आदमी है तो वह अपना और अपने बच्चों का का पालन पोषण धार्मिक कार्यों को करा कर धन अर्जित करता है जिसके कारण उसकी सभी जरूरतें पूरी हो जाती हैं। ऐसे ही सभी जातियों का एक पारंपरिक व्यवसाय है जिसके द्वारा सभी लोग अपना और अपने बच्चों का भरण पोषण करने में सक्षम हो पाते हैं।

3-सामाजिक सुरक्षा(social security)

जाति व्यवस्था के द्वारा समाज में जाति के प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को काफी सुरक्षित महसूस करता है क्योंकि यदि उस व्यक्ति को कोई अन्य जाति का व्यक्ति उसे प्रताड़ित करता है तो जाति के प्रत्येक मनुष्य उसके साथ खड़े हो जाते हैं और उसे सुरक्षित होने का पूर्ण विश्वास दिलाते हैं। जिससे समाज में व्यक्ति अपने आप को काफी सुरक्षित महसूस करता है।

4-जीवनसाथी चुनने में आसानी(easy in marriage)

जाति व्यवस्था में सबसे बड़ा गुण यह होता है कि लोग अपने ही जातियों में विवाह करते हैं जिसके कारण जीवन साथी चुनने में ज्यादा परेशानी नहीं होती है क्योंकि उन्हें पहले से ही पता रहता है कि हमें अपने ही जाति में विवाह करना है इसलिए वह पहले ही अपने जीवनसाथी को चुन लेते हैं।

जाति व्यवस्था के दोष(defect of cast system)

जाति व्यवस्था में तमाम गुण होते हुए भी इसमें अनेक दोष पाए जाते हैं जो निम्न प्रकार से हैं।

1-छुआछूत को बढ़ावा(pramot of untuchebility)

जाति व्यवस्था में अनेक गुण है फिर भी यह दोष रहित नहीं है इसमें अस्पृश्यता एक सबसे बड़ा दोष है जो समाज के लिए एक अभिशाप है। छुआछूत के द्वारा निम्न जाति के लोगों को दूर रखा जाता है उनको अनेक कार्यों में भाग लेने की अनुमति नहीं होती है जिससे समाज में अनेकता की भावना को बढ़ावा मिलता है।

2-निम्न जातियों का शोषण(expoitation of lower casts)

जाति व्यवस्था मैं निम्न जातियों को यह निम्न दृष्टि से देखा जाता है जिनका उच्च जाति वाले काफी शोषण करते हैं। समाज में निम्न जातियों के लोगों से काफी मेहनत का काम कराया जाता है और जो उच्च जाति के लोग हैं वह तो उसकी मजदूरी भी नहीं देते हैं। और उसे एक नीच जाति का व्यक्ति समझ कर प्रताड़ित करते हैं।

3-व्यक्तिगत विकास में बाधक(endrance to personal development)

जाति व्यवस्था के द्वारा जो उस जाति के सदस्य होते हैं उनके सभी के लिए सिर्फ एक परंपरागत कार्य होता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरित होती रहती है। परंतु जाति में रहने वाले सभी सदस्य एक तरह के नहीं होते हैं क्योंकि इनमें तमाम व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जिनकी सोच और बुद्धि अधिक ऊंचाइयों को छूना चाहती है परंतु वह अपने परंपरागत व्यवसाय के कारण आगे नहीं बढ़ पाते हैं और तुम्हें भी समाज में जाति के प्रत्येक सदस्यों की तरह परंपरागत व्यवसाय में संलग्न रहकर ही जीवन व्यतीत करना पड़ता है।

4-राष्ट्रीय विकास में बाधक(obstacles of national development)

जाति व्यवस्था सिर्फ समाज के ही विकास में नहीं अपितु राष्ट्र के विकास में भी बाधा उत्पन्न करती है। क्योंकि जाति व्यवस्था के द्वारा मनुष्य के प्रतिभा talent को दबा दिया जाता है जिसके कारण वह मनुष्य चाहते हुए भी आगे नहीं बढ़ पाता है जिसके कारण देश का विकास रुक जाता है।

5-सामाजिक विघटन(social disintegration)

जाति व्यवस्था के द्वारा सामाजिक विघटन को काफी प्रोत्साहन मिलता है क्योंकि जाति व्यवस्था पूरे समाज को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित करती है जिसके कारण एक जाति से दूसरे जाति के लोगों में ईर्ष्या की भावना जागृत हो जाती है और वह एक दूसरे से लड़ने के लिए तैयार हो जाते हैं और इससे समाज में विघटन उत्पन्न हो जाता है।

भारत में जातिवाद की वर्तमान स्थिति(situation of caste system in India modern time)

भारत में जातिवाद अब पहले की तरह उतना गठित नहीं है। क्योंकि पहले की अपेक्षा अब लोग काफी पढ़े लिखे और समझदार हो गए हैं जो परंपरागत बातों पर बहुत कम विश्वास करते हैं और पढ़ लिखकर हुए अपने विकास की आगे बढ़ते हैं। भारत में जातिवाद विवाह और खानपान तक ही सीमित रह गया है बाकी सभी तथ्यों ने जातिवाद लगभग ना के बराबर है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button