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रस किसे कहते हैं। रस के प्रकार उदाहरण सहित Ras kise kahate Hain, Ras ke prakar in hindi.rstbox

रस किसे कहते हैं। रस के प्रकार उदाहरण सहित Ras kise kahate Hain, Ras ke prakar in hindi.rstbox

नमस्कार दोस्तों ,आप लोगों का हमारे वेबसाइट पर बहुत-बहुत स्वागत है, हमारा आज का टॉपिक हिंदी व्याकरण से हैं। हमारे हिंदुस्तान में हिंदी का बहुत ही महत्व है अतः व्याकरण के बिना हिंदी भी अधूरी है। इसलिए हिंदी को अच्छी तरह से समझने के लिए व्याकरण का ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है अतः मैं आप लोगों के लिए आज व्याकरण से रस के बारे में बात करने वाले हैं। रस क्या होता है रस कितने प्रकार के होते हैं तथा दसो रस के परिभाषा तथा सटीक उदाहरण आपको इस पोस्ट में मिल जाएगा।यदि आपको दसों रस के बारे में पूरी जानकारी है तो आप किसी भी काव्य को पढ़कर बड़ी आसानी से जान सकते हैं कि इसमें कौन सा रस है। परीक्षा में कुछ कविता लिखकर यह पूछा जाता है कि इसमें कौन सा रस है अतः यदि आपको रस के बारे में पता है तो आप बड़ी ही आसानी से किसी भी कविता में या पता लगा सकते हैं कि इसमें कौन सा रस होता है। अतः पूरी जानकारी के लिए हमारे इस आर्टिकल को ध्यान से पढ़ें इसमें आपको संपूर्ण रसों तथा उसके पाठ कौन-कौन से हैं संपूर्ण जानकारी मिल जाएगा।

रस किसे कहते हैं Ras kise kahate Hain

किसी काव्य, कविता, नाटक को पढ़ने देखने या सुनने से हिर्दय में जो भाव उत्पन्न होता है उसे रस कहते हैं। आपने देखा होगा कि टीवी में फिल्म देखते समय बहुत लोग हंसने लग जाते हैं कभी रोने लग जाते हैं कभी क्रोध में आ जाते हैं अतः इसी को ही रस कहा जाता है। उसी प्रकार किसी भी कविता को या नाटक को पढ़ने से जिस तरह का भाव उत्पन्न होता है उसे रस कहा जाता है।
सामान्य शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जब कोई काव्य का पाठक अथवा श्रोता या नाटक को देखने वाला जब काव्य को पड़ता है या सुनता है तथा देखता है उस समय उसके हृदय में जो भाव उत्पन्न होते हैं तथा जिस तरह का आनंद उत्पन्न होता है उसे रस कहा जाता है। रस के चार अंग माने जाते हैं जो निम्नलिखित हैं।
  • स्थाई भाव
  • विभाव
  • अनुभव
  • संचारी भाव

1-स्थाई भाव sthai bhav

यह भाव हमारे मन में स्थाई रूप से विद्यमान रहते हैं। सामान्य शब्दों में यह कहा जाता है मनुष्य के हृदय में जो भाव स्थाई रूप से या हमेशा विद्यमान रहते हैं उन्हें स्थाई भाव कहा जाता है। रति, हास ,शोक, क्रोध ,भय ,घृणा ,विस्मय वात्सल्य ,निर्वेद और उत्साह मनुष्य के शरीर में स्थाई रूप से विद्यमान रहते हैं इसलिए इन्हें स्थाई भाव की संज्ञा दी जाती है।

2-विभाव vibhaw

जिन कारणों से मनुष्य के हृदय के स्थाई भाव जागृत होते हैं उन्हें विभाव कहा जाता है। सामान्य शब्दों में यह कहा जाता है कि जब किसी व्यक्ति या वस्तु तथा स्थान का वर्णन सुननी है देखने से मनुष्य के हृदय की स्थाई भाव जागृत हो जाती है अतः जिस व्यक्ति वस्तु या स्थान के वर्णन से स्थाई भाव जागृत हो उसे विभाव कहा जाता है। विभाव के 2 अंग माने जाते हैं।
  • आलंबन विभाव स्थाई भाव को जागृत करने के आश्रय को आलंबन विभाव कहते हैं।
  • उद्दीपन विभाव स्थाई भाव को और अधिक बढ़ाने वाले को उद्दीपन विभाव कहा जाता है।

3 अनुभाव anubhaw

आश्रित व्यक्ति के शरीर में प्रकट होने वाले भाव को अनुभव कहा जाता है। आपने देखा होगा कि जब कोई कहानी या नाटक देखा जाता है उसके पश्चात हमारे शरीर में रोंगटे खड़े होने तथा आंख से आंसू गिरने लग जाते है ।इसे अनुभाव कहा जाता है।

4-संचारी भाव sanchari bhaw

जो भाव आश्रित के मन में अस्थिर रूप से कोई भाव उत्पन्न करते है।उन्हें संचारी भाव कहा जाता है। यह मनुष्य के शरीर में कभी-कभी आते हैं और समाप्त हो जाते हैं। जैसे-मोह ,जड़ता, चपलता, दीनता,निद्रा,शंका,ग्लानि, हर्ष,आवेग, चिंता, ग्लानि आदि 33 संचारी भाव होते हैं जो मनुष्य के हृदय में कभी-कभी आते हैं और कुछ देर बाद समाप्त हो जाते हैं।
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दसों रस और उनके स्थाई भाव dason ras aur unke sthai bhaw

  • शृंगार रस स्थाई भाव रति
  • हास्य रस स्थाई भाव हंसी
  • करुण रस स्थाई भाव शोक
  • रौद्र रस स्थाई भाव क्रोध
  • भयानक रस स्थाई भाव भय
  • विभत्स रस स्थाई भाव घृणा
  • अद्भुत रस स्थाई भाव विस्मय
  • वीर रस स्थाई भाव उत्साह
  • शांत रस स्थाई भाव नीर्वेद
  • वात्सल्य रस स्थाई भाव वत्सल

1-श्रृंगार रस shrnigar ras

जिस काव्य अथवा नाटक में नायक और नायिका के प्रेम का वर्णन किया जाए वहां पर शृंगार रस होता है। नायक नायिका का अर्थ स्त्री और पुरुष के प्रेम का वर्णन होता है उसे श्रृंगार रस कहा जाता है श्रृंगार रस का स्थाई भाव रति है। श्रृंगार रस को सभी रसों का राजा कहा जाता है। श्रृंगार रस को दो भागों में विभक्त किया गया है।
1-संयोग श्रृंगार जहां पर कोई नायक और नायिका या नर और नारी के मिलन के द्वारा मिलने वाली खुशी का वर्णन किया जाता है वहां पर शृंगार रस होता है जैसे-बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाय।
सौंह कहै भौहन हंसे देन कहे नटी जाए।
इस काव्य में भगवान श्री कृष्ण और राधा के मिलन का वर्णन किया गया है इसलिए इसमें संयोग श्रृंगार रस है।
2-वियोग श्रृंगार जहां पर नायक और नायिका की बिछड़ने से होने वाले वियोग का वर्णन किया जाता है वहां पर वियोग श्रृंगार होता है अर्थात जहां पर दो प्रेमी एक दूसरे से बिछड़ जाते हैं और एक दूसरे से मिलने के लिए जो बिरहा अथवा दुख का वर्णन किया जाता है उसे वियोग शृंगार कहा जाता है। वियोग श्रृंगार का उदाहरण-
“अखियां हरी दर्शन की भूखी”

2-हास्य रस hasy ras

जहां पर किसी काव्य अथवा नाटक को देखने पढ़ने और सुनने से हंसी उत्पन्न हो वहां पर हास्य रस होता है कभी-कभी ऐसा होता है कि जब हम कोई कविता पढ़ रहे होते हैं तो उसमें इस प्रकार का वर्णन होता है कि हम अपनी हंसी रोक नहीं पाते हैं और पढ़ते-पढ़ते हंसने लग जाते हैं वहां पर हास्य रस होता है हास्य रस का स्थाई भाव हंसी है। हास्य रस का उदाहरण-
मैं महावीर हूं पापड़ को तोड़ सकता हूं।
गुस्सा आ जाए तो कागज को मरोड़ सकता हूं।
इस काव्य को पढ़ने से आप लोग खुद ही जानते होंगे की सभी लोगों को हंसी आ जाएगी इसलिए यहां पर हास्य रस कहा जाएगा।

3-करुण रस karun ras

जब किसी काव्य को पढ़ने से अथवा किसी नाटक को देखने से हमारे हृदय में शोक की भावना उत्पन्न हो वहां पर करुण रस होता है करुण रस का स्थाई भाव शोक है। जब भी किसी स्थान पर सहृदय के हृदय में कोई नाटक अथवा काव्य पढ़ने से शोक उत्पन्न हो जाए अर्थात उसका हृदय दुखित हो जाए वहां पर करुण रस कहा जाता है। करुण रस का स्थाई भाव शोक है। करुण रस का उदाहरण-
हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी तुम देखी सीता मृगनैनी?
इस काव्य में श्री रामचंद्र की पत्नी सीता का हरण हो जाता है जिसके कारण वह दुखित होकर जंगल में सीता को खोजते हुए पशु पक्षियों तथा पेड़ पौधों से यह प्रश्न करते हैं की क्या आपने हमारी सीता को कहीं देखा है? अता यहां पर श्री रामचंद्र के शोक का वर्णन किया गया है इसलिए यहां पर करुण रस होता है।

4-रौद्र रस raudra ras

रौद्र रस का स्थाई भाव क्रोध है। अतः जब कोई काव्य पड़ने पर किसी कारण बस हमारे मन में क्रोध उत्पन्न हो वहां पर रौद्र रस होता है। यह जिसका भी में अथवा नाटक में होने वाले क्रोध का वर्णन किया जाता है वहां पर रौद्र रस होता है। रौद्र रस का उदाहरण-
अति रिसि बोले बचन कठोरा, कहुं जड़ जनक धनुष के तोरा।
बेगि देखाऊ मूढ़ नतु आजू, उल्टौ महि जह लगि तव राजू।
इस काव्य में श्री राम के द्वारा शिव धनुष टूट जाने पर परशुराम जी को पता लगता है तो वह अत्यंत क्रोधित होकर आते हैं और यह बात जनक से कहते हैं कि उसका नाम जल्दी बताओ जिसने यह धनुष भंग किया है नहीं तो आज तुम्हारा सिंहासन और संपूर्ण राजाओं को तहस-नहस करके रख दूंगा। इस काव्य को पड़ने पर हमारे मन में क्रोध की भावना उत्पन्न होती है इसलिए यहां पर रौद्र रस है।

5-भयानक रस bhayanak ras

भयानक रस का स्थाई भाव भय है। आता जब किसी का भी को पड़ने पर या तो किसी नाटक को देखने पर हमें डर लगने लग जाए अथवा भय की स्थिति उत्पन्न हो वहां पर भयानक रस होता है। जब किसी काव्य अथवा नाटक को पढ़ने का देखने कथा सुनने पर सहृदय के हृदय में उपस्थित विभाग और संचारी भाव एक साथ मिलते हैं तो वहां पर भयानक रस होता है। भयानक रस का उदाहरण-
एक ओर अजगर सिंह लखि, एक और मेरे मृग राय।
विकट बटोही बीच परयों मूर्छा खाए।
इस इस काव्य में यह कहा गया है कि एक पथिक कहीं जा रहा था अचानक उसके एक तरफ अजगर आ गया और जब वह दूसरी तरफ भागने की कोशिश करता है तो दूसरी तरफ भी शेर आ जाता है जिसके कारण वह पथिक भयभीत होकर बीच रास्ते में बेहोश होकर गिर जाता है। इसलिए इस काव्य में भयानक रस कहा जाता है।

6-वीभत्स रस vibhts ras

जिसका काव्य अथवा नाटक में किसी वस्तु से घृणा का वर्णन किया जाए, वहां पर वीभत्स रस होता है। वीभत्स रस का स्थाई भाव घृणा होता है। सामान्य शब्दों में हम यह कह सकते हैं कि जब हम कोई कार्य अथवा नाटक पढ़ रहे होते हैं या देख रहे होते हैं तो उसका और नाटक में किसी व्यक्ति वस्तु या स्थान से घृणा का वर्णन हो और उसे देखने पढ़ने और सुनने से हमारे मन में घृणा की स्थिति उत्पन्न होने लग जाए तो उसे वीभत्स रस कहा जाता है। वीभत्स रस का उदाहरण-
सिर पर बैठो काग, आंखी दोऊ खात निकारत।
खींचत जीभाहि स्यार, अति आनन्द और धारत
इस काव्य में इस तरह का वर्णन किया गया है कि आप खुद ही पढ़ कर देख सकते हैं कि इसको पढ़ने से हमारे मन में किस तरह के अनुभव होने लग जाते हैं। इसका भी को पढ़ने से हमारे मन में एक घृणा की भावना उत्पन्न होने लग जाती है अर्थात घिन आने लग जाती है इसलिए यहां पर वीभत्स रस कहा जाता है।

7-अद्भुत रस adbhut ras

जिस काव्य अथवा नाटक में किसी आश्चर्यजनक बातों का वर्णन किया जाए वहां पर अद्भुत रस होता है। अर्थात जब किसी का व्यथा नाटक में आश्चर्यचकित कर देने वाली वर्णन हो या  उनको पढ़ने से हमारे मन में आश्चर्य होने लग जाए तो उसे अद्भुत रस कहा जाता है। अद्भुत रस का स्थाई भाव विस्मय है। अद्भुत रस का उदाहरण-
बिनु पद चले सुने बिनु काना।
कर बिनु कर्म करें विध नाना।
इस काव्य का अर्थ है बिना पैर के चल सकता है बिना कान के सुन सकता है हाथ नहीं है फिर भी कई प्रकार के कार्य कर सकता है। अतः यह काव्य विस्मय से युक्त है। इस काव्य को पढ़ने से हमारे मन में एक प्रकार का आश्चर्य हो रहा है की पैर नहीं है तो कैसे चलेगा काम नहीं है तो कैसे सुनेगा परंतु सुन सकता है चल सकता है और हाथ ना होते हुए भी अनेक प्रकार के कार्य कर सकता है ऐसा क्या हो सकता है।अर्थात इसको पढ़ने से हमारे मन में कई तरह के आश्चर्यजनक सवाल उठते हैं इसलिए यहां पर अद्भुत रस कहा जाएगा।

8-वीर रस veer ras

वीर रस का स्थाई भाव उत्साह है। जब किसी का भी को पढ़ने या नाटक को देखने से हमारे मन में उत्साह की भावना प्रकट होती है तो वहां पर वीर रस होता है। स्थाई भाव उत्साह हमारे मन में पहले से विद्यमान रहता है परंतु उनको जगाने वाले विभाव जो स्थाई भाव को जगाने के कारण होते हैं उनके द्वारा जब स्थाई भाव उत्साह को जागृत कर दिया जाता है । तो वहां पर वीर रस कहलाता है। वीर रस का उदाहरण-
तोड़ो छत्रक दंड जिम तब प्रताप बल नाथ।
जो न करो प्रभु पद शपथ तो ना धरउ धनु हाथ
इस काव्य को पढ़ने से हमारे मन में उत्साह उत्पन्न होता है और हमारे शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस काव्य में कहा गया है कि जब राजा जनक यह कहते हैं कि इस पृथ्वी पर अब कोई भी ऐसा वीर नहीं रहा जो इस धनुष को तोड़ सके इस पर राम के छोटे भाई लक्ष्मण जिन्हें शेषनाग का अवतार कहा जाता है उनकी उत्साह जागृत हो जाती है और वह यह वचन बोलते हैं की-आप इस धनुष की बात करते हैं तो इस धनुष को मैं एक कमजोर डंडे की भांति तोड़ कर फेंक सकता हूं। और मैं प्रभु श्री राम के चरणों की सौगंध लेकर कहता हूं अगर मैं ऐसा नहीं कर पाया तो अपनी संपूर्ण जिंदगी में धनुष को हाथ तक नहीं लगाऊंगा।

9-शांत रस shant ras

शांत रस का स्थाई भाव निर्वेद है। जिस काव्य में किसी बैरागी की भावना तथा पश्चाताप की भावना प्रकट की जाए वहां पर शांत रस होता है। जब किसी का भी अथवा नाटक को देखने आया पढ़ने तथा सुनने से हमारे मन में शांति की भावना उत्पन्न हो जाती है यह हमारा मन कुछ समय के लिए शांत हो जाता है वहां पर शांत रस होता है।
शांत रस का उदाहरण-
ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोए।
औरन को शीतल करे आपहू शीतल होय।
कबीर दास जी के इस दोहा को पढ़ने से हमारे मन में एक प्रकार की शांति छा जाती है तथा हमारा मन स्थिर हो जाता है इसलिए यहां पर शांत रस होता है।

10-वात्सल्य रस watshalya ras

जिस काव्य को पढ़ने से हृदय में बच्चों के प्रति प्रेम या बच्चों से दोस्ती की भावना प्रकट होती है। वहां पर वात्सल्य रस होता है। सामान्य शब्दों में यह कहा जाता है कि जिसका व्यथा नाटक में किसी बच्चे के किलकारी मार कर हंसने की तथा मां और बच्चे की प्रेम के प्रशन का वर्णन किया जाता है उसके द्वारा हमारे मन में जो वत्सल या बच्चों के प्रति प्रेम की भावना उत्पन्न होती है उसे वात्सल्य रस कहा जाता है। वात्सल्य रस का स्थाई भाव वत्सल है। वात्सल्य रस का उदाहरण-
मैया मोहे दाऊ बहुत खिझायो।
मो सो कहत मोल को लीन्हयो,तू जसुमत कब जायो।
इस काव्य में सूरदास जी ने भगवान श्री कृष्ण के बाल रूप का वर्णन किया है। इस पद्य का आशय है श्री कृष्ण माता यशोदा से कहते हैं कि माता मुझे बलदाऊ भैया बहुत चिढ़ाते हैं और मुझे कहते हैं की आपने जन्म नहीं दिया बल्कि खरीद कर लाए हैं। यहां पर श्री कृष्ण के बाल रूप का बहुत ही सुंदर वर्णन किया गया है और इसे पढ़ने से हमारे मन में श्री कृष्ण के बाल रूप के दर्शन हो जाते हैं इसलिए यहां पर वात्सल्य रस होता है।

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