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विवाह का अर्थ उद्देश्य और विशेषताएं(purpose of marriage. in Hindi)

विवाह किसे कहते हैं (what is the marriage)

नमस्कार दोस्तों आज मैं आप लोगों के साथ ऐसे विषय पर बात करने वाला हूं जो सभी मनुष्य और औरत के जीवन में आता है। और उस समय का लड़की और लड़का सभी को बहुत ही बेसब्री से इंतजार रहता है जिसे हम विवाह ,शादी, मैरिज आदि नामों से जानते हैं। दोस्तों विवाह 1 अभौतिक विषय है जो हमें दिखाई नहीं देता है क्योंकि विवाह एक स्त्री पुरुष का एक ऐसा संबंध है कि जो जीवन में एक बार ही आता है। विवाह के पवित्र बंधन में लड़का और लड़की एक दूसरे का साथ देने के लिए प्रतिबद्ध होकर अपना सुखमय जीवन व्यतीत करते हैं। विवाह एक ऐसा संबंध है जिसमें दो आत्माओं का मिलन होता है और इस बंधन के द्वारा दोनों आत्माएं मिलकर एक हो जाती हैं और वह पति पत्नी के रूप में अलग अलग दिखाई देते हैं परंतु उनके विचार उनके गुण और उनके कार्य में समानता होती है। आजकल के लोग विवाह को जितना आसानी से बता देते हैं समझा देते हैं इतना आसान इसे समझना नहीं होता है क्योंकि विवाह सिर्फ एक तरह का नहीं होता है इसमें तमाम पहलू होते हैं जिन्हें समझने के लिए आप हमारे पोस्ट को पूरा पढ़े। बहुत विवाह ऐसे भी होते हैं जो विवाह होने के बाद भी उनके विचार एक नहीं हो पाते हैं और उनके संबंधों में धीरे-धीरे दरार आने लग जाती है और उनकी पति पत्नी का रिश्ता धीरे-धीरे खत्म हो जाता है ।

परिभाषा (definition)

रिवर्स के अनुसार “जिन साधनो के द्वारा मानव समाज यौन संबंधों को बनाए रखता है उसे विवाह की संज्ञा दी जाती है।”
 बोगार्ड्स के अनुसार “विवाह एक ऐसी संस्था है जिसके द्वारा मनुष्य अपने पारिवारिक जीवन में प्रवेश करता है”
मजूमदार एवं मदान के अनुसार “एक ऐसी संस्था जिसके द्वारा दो  विसमलिंगी लोगों को यौन क्रिया और उनसे जुड़े हुए आर्थिक और सामाजिक संबंधों को बनाए रखने के लिए समाज द्वारा या कानून द्वारा पूर्ण सहमति दी जाती है उसे विवाह कहते हैं”
उपरोक्त परिभाषाओं को पढ़ने के बाद इसको सीधे अर्थों में समझने के लिए यह कहा जा सकता है कि समाज में प्रचलित एक ऐसी संस्था जिसके द्वारा एक स्त्री और पुरुष एक पवित्र बंधन में जिसका नाम विवाह है बंध जाते हैं। और इसके द्वारा यौन क्रिया तथा सामाजिक और आर्थिक जिम्मेदारियों को निभाने का स्वीकृति समाज के द्वारा मिल जाती है।उसे विवाह कहा जाता है।

विवाह के प्रकार (types of marriage)

हमारे समाज में प्रचलित विवाह मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं जो निम्नलिखित हैं।
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1-एक विवाह (single marriage)

जब किसी समाज में एक स्त्री और एक पुरुष धार्मिक और सामाजिक नियमों के अनुसार एक दूसरे से पति पत्नी का संबंध बनाते हैं तो उसे एक विवाह कहा जाता है। एक विवाह में पति पत्नी में दूसरे के प्रति काफी गहरा प्रेम देखने को मिलता है। एक विवाह भारतीय समाज में बहुत ज्यादा प्रचलित है तथा भारतीय संस्कृति में इसको काफी सम्मान भी प्राप्त है। एक विवाह हिंदुओं का एक ऐसा संस्कार है जो जीवन में सिर्फ एक बार होता है अगर जीवन के खत्म होने से पहले किसी एक की मृत्यु हो जाती है तो दूसरा अकेले ही बाकी जीवन व्यतीत करता है।

2-बहुविवाह(multiple marriage)

बहु विवाह मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं जो निम्नलिखित हैं।

1-बहु पत्नी विवाह (multiple wife marriage)

जब किसी समाज अथवा देश में एक पुरुष कई स्त्रियों के साथ विवाह करते हैं तो उसे बहु पत्नी विवाह कहा जाता है। बहु पत्नी विवाह में पति पत्नियों के बीच में प्रेम संबंध बहुत ही कम पाया जाता है यह विवाह सिर्फ यौन क्रियाओं की पूर्ति और कई समाज में तो इसे पुरुषों का सम्मान भी माना जाता है परंतु भारतीय समाज में इसका कोई महत्व नहीं है।

2-बहुपति विवाह (multiple husband marriage)

जब किसी देश समाज में एक स्त्री कई पुरुषों के साथ विवाह करती हैं तो उसे बहुपति विवाह कहा जाता है। यह विवाह भी आधुनिक युग में बहुत कम हो गया है यह विवाह ज्यादातर जनजातीय समाज में पाया जाता है।इस समाज के लोग ज्यादातर अनपढ़ और जंगलों में रहने वाले होते हैं जिन्हें सामाजिक संस्कृति और संस्कारों का ज्ञान नहीं होता है उन स्थानों पर बहुपति विवाह का प्रचलन पाया जाता है।

3-अंतर विवाह (endogamy)

जब कोई व्यक्ति समाज में अपनी जाति और समुदाय के दायरे में विवाह करता है तो उसे अंतर विवाह कहा जाता है। अंतर विवाह के कुछ नियम होते हैं जिस के अनुकूल ही विवाह करना होता है इसके नियम धार्मिक और सामाजिक तथा आर्थिक भी हो सकते हैं। यह विवाह का एक दायरा होता है इसके अंदर रहकर ही वैवाहिक प्रिया संपन्न की जाती है।

4-बहिर्विवाह(out marriage)

बहिर्विवाह अंतर्विवाह का सीधा विलोम शब्द है अतः इस विवाह में कोई सामाजिक दायरा नहीं होता है बल्कि यह विवाह किसी भी जाति अथवा समुदाय में किया जा सकता है जिसमें एक स्त्री और एक पुरुष किसी भी जाति समुदाय वर्ग देश क्षेत्र का हो। इस विवाह में कोई प्रतिबंध नहीं है की विवाह सिर्फ अपने जाती और समुदाय में ही करना है।
तमाम विद्वानों के द्वारा विवाह कई प्रकार के बताए जाते हैं जो निम्नलिखित हैं।
  1. ब्रह्म विवाह
  2. पिशाच विवाह
  3. राक्षस विवाह
  4. गंधर्व विवाह
  5. प्रेम विवाह
  6. प्रजापत्य विवाह
  7. आर्ष विवाह
  8. असुर विवाह
  9. अनुलोम विवाह
  10. प्रतिलोम विवाह

विवाह की विशेषताएं (features of marriage)

विवाह के कुछ मुख्य विशेषताएं होती हैं जो निम्नलिखित हैं।

1-विश्वव्यापी प्रक्रिया (worldwide)

विवाह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसका कोई निश्चित देश काल नहीं है अपितु यह विश्वव्यापी प्रक्रिया है। क्योंकि हर एक देश में अर्थात संपूर्ण विश्व में विवाह की क्रिया अवश्य पाई जाती है परंतु उसके अलग-अलग जगह पर अलग अलग स्वरूप दिखाई देने को मिलते हैं। क्योंकि अलग-अलग देशों में अपने रीति-रिवाजों और नियमों के अनुसार ही विवाह की क्रिया को संपन्न किया जाता है ।

2-एक स्थाई संबंध (permanent relationship)

विवाह एक स्थाई संबंध है। क्योंकि यह संबंध विवाह के समय अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लिए जाते हैं।अतः यह संबंध सात जन्मों के लिए अटूट बंधन हो जाता है। परंतु आजकल के युग में लोग विवाह को एक यौन संतुष्टि का साधन मानते हैं। आधुनिक युग में भी विवाह के संबंध को सबसे ज्यादा स्थाई माना गया है। क्योंकि यह संबंध 21 साल से लेकर मृत्यु तक कायम रहती है।

3-दो विषम लिंगियों का होना आवश्यक (must have two heterosexuals)

विवाह की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें एक स्त्री और एक पुरुष का होना अत्यंत आवश्यक होता है। क्योंकि किसी अकेले स्त्री अथवा पुरुष का विवाह होना असंभव है। विवाह के लिए स्त्री और पुरुष के जोड़े का होना अत्यंत आवश्यक होता है। जिस प्रकार से दो स्त्री का विवाह एक दूसरे से नहीं हो सकता उसी प्रकार दो पुरुष का विवाह एक दूसरे के साथ नहीं हो सकता। अतः एक भी विसमलिंगी जोड़े का होना अत्यंत आवश्यक है।

4-दो आत्माओं का मिलन (the unian of two sols)

विवाह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें दो आत्माओं का मिलन होता है। जो विवाह रूपी एक पवित्र बंधन में एक दूसरे के साथ जन्म जन्मांतर के लिए बंध जाते हैं। यह दोनों आत्माएं दो शरीर तो रहती है परंतु इनके विचार और उनके कार्य और उद्देश्य सिर्फ एक होता है जिन्हें पति-पत्नी की संज्ञा दी जाती है। यदि उनके विचार और कार्य एक दूसरे से नहीं मिलता है तो उनका संबंध बहुत ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाता है। 

विवाह के कुछ प्रमुख उद्देश्य (purpose of marriage)

दोस्तों विवाह किसे कहते हैं यह तो आप लोग जान ही चुके होंगे तो चलिए आगे के लेख में हम विवाह के उद्देश्य को समझेंगे।

1-यौन इच्छाओं की पूर्ति (fullfilment pop sexual deries)

जब एक बच्चा छोटा होता है तो उसका यौन इच्छा 0 होता है परंतु जैसे-जैसे उसकी उम्र बढ़ती जाती है वैसे वैसे उसकी यौन इच्छाओं में भी विकास होता है। और जब वह मनुष्य 18 वर्ष को पार कर जाता है तो वह पूर्ण रुप से यौन क्रिया के लिए तत्पर हो जाता है अतः उससे यौन क्रियाओं की पूर्ति के लिए समाज एक ऐसी संस्था जिसका नाम विवाह होता है। विवाह को समाज के द्वारा पूर्ण स्वीकृति होती है। तथा धार्मिक और सामाजिक नियमों के द्वारा विवाह को संपन्न कराया जाता है और वह संपूर्ण जीवन एक दूसरे के साथ रहने लग जाते हैं।

2-संतानोत्पत्ति (procreation)

विवाह के द्वारा ही संतान की उत्पत्ति संभव है क्योंकि कोई भी समाज अथवा धर्म अवैध तरीके से उत्पन्न संतान को स्वीकृति नहीं देता है। अतः हमें संतान उत्पत्ति के लिए विवाह अत्यंत आवश्यक है। विवाह के द्वारा हम अपनी यौन क्रियाओं को पूर्ण करते हैं जिसके फलस्वरूप संतान की उत्पत्ति होती है। यह व्यवस्था सर्वव्यापी होती है यह सिर्फ मनुष्य में ही नहीं बल्कि किसी ना किसी रूप में जीव जंतुओं में और पशु पक्षियों में भी दिखाई देती है।

3-संस्कृति का हस्तांतरण (transfer of culture)

विवाह के द्वारा ही संस्कृति का हस्तांतरण संभव हो पाता है क्योंकि जब संतान की उत्पत्ति होती है तो हम अपनी संस्कार और संस्कृति अपने बच्चों को प्रदान करते हैं तथा हमारे बच्चे उस संस्कृति को अपने बच्चों को प्रदान करते हैं। इस तरह से संस्कृति का एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरण होता रहता है। और हमारी सभ्यता और संस्कृति समाज में स्थिरता बनाए रखती है। समय के अनुसार इसमें कुछ बदलाव भी होते रहते हैं।

4-परिवार का निर्माण (family buildings)

परिवार का निर्माण करने के लिए हमें विवाह अत्यंत आवश्यक है क्योंकि विवाह के द्वारा ही हमारे घर में नए व्यक्तियों का आगमन होता है जिसके कारण परिवार की स्थिरता बनी हुई रहती है अगर वैवाहिक क्रिया को स्थगित कर दिया जाए तो पारिवारिक स्थिरता समाप्त हो जाएगी और समाज में प्रत्येक मनुष्य एक अकेला व्यक्ति रह जाएगा जिससे समाज अलग-थलग हो सकता है।

5-नवीन अधिकार और कर्तव्यों का निर्माण (creation of new rights and duties)

जब तक मनुष्य का वैवाहिक क्रिया संपन्न नहीं होता है तब तक उसका अधिकार और कर्तव्य सिर्फ माता-पिता तक ही सीमित रहता है। परंतु जब उसका विवाह संपन्न हो जाता है तो उसके जीवन में नए अधिकार और कर्तव्यों का जन्म होता है। जब तक मनुष्य का वैवाहिक क्रिया संपन्न नहीं होता है तब तक मनुष्य जीवन अधूरा रहता है परंतु विवाह के पश्चात मनुष्य अपने पूर्ण व्यक्तित्व को प्राप्त करता है। जब मनुष्य का विवाह हो जाता है तब उसका समाज के प्रति और अपने धर्म के प्रति कर्तव्यों में वृद्धि हो जाती है। जिसके कारण समाज की स्थिरता कायम रहती है।

6-संतानों का समाजीकरण (socialization of offspring)

भारत की अपेक्षा अन्य देशों में लोग विवाह ना करके भी किसी भी स्त्री के साथ यौन क्रिया की पूर्ति कर लेते हैं। और उनसे प्राप्त संतान को अपनी संतान मान लेते हैं। परंतु उनका समाजीकरणसमाजीकरण अच्छे ढंग से नहीं हो पाता है क्योंकि समाज ऐसी संतान को संतान नहीं मानती है बल्कि यह विवाह के द्वारा ही संभव है कि संतान को समाज एक वैध संतान समझे और समाज में उसे पूर्ण रूप से स्वीकृति प्रदान करें। विवाह के द्वारा पति पत्नी के यौन क्रिया के फल स्वरुप जो संतान प्राप्त होते हैं उनका पूर्ण रूप से सामाजिक और संस्कृति का ज्ञान कराना पति पत्नी की पूरी जिम्मेदारी होती है जिसे दोनों मिलकर इस जिम्मेदारी को पूरा करने में सक्षम हो पाते हैं।

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