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संस्था किसे कहते है परिभाषा तथा विशेषताएं,sanstha kise kahte hai.arth paribhasha tatha visheshtaen.rstbox

संस्था किसे कहते है?अर्थ, परिभाषा, तथा विशेषताएं,sanstha kise kahte hai.arth paribhasha tatha visheshtaen.rstbox

नमस्कार दोस्तों आप लोगों का हमारे वेबसाइट पर आने के लिए बहुत-बहुत स्वागत है। आज के पोस्ट में आप लोगों के लिए हम समाज से जुड़ी हुई एक ऐसी नियम या प्रक्रिया को आप लोगों के समक्ष पेश कर रहा हूं जिसके बारे में समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को जानना बहुत ही आवश्यक है। हो सकता है आप लोगों ने भी कहीं ना कहीं संस्था का नाम जरूर सुना होगा और यह अधिकतर सोशल साइंस social since से जुड़ा हुआ प्रश्न है कि संस्था किसे कहते हैं ?और अधिकतर परीक्षाओं में भी आता है जिसके लिए आप लोग को भी यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि संस्था किसे कहते हैं? इस पोस्ट में आज आप लोगों को संस्था से जुड़े हुए अनेक प्रश्न जैसे संस्था की परिभाषा क्या होती है? संस्था का अर्थ क्या होता है? हमारे समाज में संस्था का क्या महत्व है? तथा संस्था की क्या-क्या विशेषताएं होती है? इत्यादि तमाम प्रश्नों के उत्तर हमारे पोस्ट में मिल जाएंगे। समाज में रहते हुए हमें एक दूसरे की मदद करनी होती है क्योंकि यदि समाज में रहकर एक दूसरे के प्रति प्रेम भाव तथा एक दूसरे के प्रति मदद की भावना समाप्त हो जाती है तो सामाजिक विघटन शुरू हो जाता है अर्थात समाज के संस्था नियम कानून सभी का खंडन होने लग जाता है जिसे सामाजिक विघटन कहा जाता है। संस्था को बहुत ही सरल शब्दों में समझने के लिए आप लोग हमारे पोस्ट को पूरा पढ़ें हमारे पोस्ट में बहुत ही सुंदर और सरल शब्दों में आपको संस्था के प्रत्येक पहलू को समझने में बड़ी ही आसानी होगी।

संस्था का अर्थ meaning of sanstha

आप लोगों ने हमारे पोस्ट में पढ़ा ही होगा कि समाज एक सामाजिक संबंधों का जाल होता है अतः संस्था भी समाज से जुड़ा हुआ प्रश्न है। संस्था का गठन मानव द्वारा कुछ अभीष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किया जाता है क्योंकि समाज में दो तरह के आवश्यकताएं होती हैं जिसमें पहला है सामान्य आवश्यकता है और दूसरा है विशिष्ट आवश्यकता है। सामान्य आवश्यकता है जैसे – “किसी का घर बन रहा है तो उसे मिस्त्री तथा लेबर की आवश्यकता होती है कोई बच्चा पढ़ना चाहता है तो उसे स्कूल की आवश्यकता होती है”। इस प्रकार से समाज में अनेक सामान्य आवश्यकता होती हैं जिनको समाज में रहकर पूरा किया जाता है और इनके नियमन के लिए या इन्हें कंट्रोल करने के लिए समुदाय का निर्माण किया जाता है। जिससे समुदाय में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति का एक निश्चित उद्देश्य होता है और एक निश्चित कार्य होता है। दूसरा विशिष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिए समिति का निर्माण किया जाता है। समिति के द्वारा विशिष्ट आवश्यकता है जैसे कानून परिवार रिश्तेदार इत्यादि यह सब समिति कहलाते हैं। इस प्रकार से दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समिति और समुदाय का गठन किया जाता है तथा इन्हें संचालित करने के लिए कुछ नियम या कानून बनाए जाते हैं जिन्हें संस्था का नाम लिया जाता है सरल शब्दों में आप समिति और समुदाय में आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाए गए नियम कानून या विधि प्रणाली को संस्था कहा जाता है जैसे परिवार एक समिति है तथा परिवार मैं पुत्र पिता के पैर छूता है एक संस्था कहलाता है। विवाह एक समिति है परंतु विवाह के कुछ नियम कानून होते हैं। जैसे “दूल्हा दुल्हन का एक दूसरे के गले में जयमाला डालना”। एक संस्था कहलाता है।

संस्था की परिभाषा definition of Sanstha

संस्था को और बेहतर ढंग से समझने के लिए कुछ समाजशास्त्रीय विद्वानों ने अपने अपने हिसाब से संस्था को परिभाषित किया है जो निम्नलिखित है।
मैकईवर एवं पेज के अनुसार-“संस्था समाज में होने वाली कार्य प्रणालियों का एक गठन है जिसके द्वारा समूह के सामूहिक तत्वों का नियमन किया जाता है”।
गार्ड्स के अनुसार-“संस्था समाज का एक ऐसा सामाजिक ढांचा होता है जो व्यक्तियों की जरूरतों के लिए बहुत ही सुदृढ़ और सुव्यवस्थित रूप से गठित किया जाने वाला नियम होता है”।
गिलिन और गिलीन के अनुसार-“संस्था समाज में प्रत्येक व्यक्तियों की जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाया जाने वाला एक ऐसा संगठन है जिसमें प्रत्येक व्यक्तियों के विचार संस्कृति और सुरक्षा का भी नियमन किया जाता है। उनके अंतर्गत लोगों के विचार और कार्य करने की तौर तरीके को संचालित किया जाता है”।
रॉस के अनुसार-“सामाजिक संस्थाएं संगठित मानवीय संबंधों की वह व्यवस्था हैं जो सामान्य इच्छा द्वारा स्थापित या स्वीकृत होती हैं।”
मैरिल और एलरिज के अनुसार,” सामाजिक संस्थाएं आचरण के वे प्रतिमान हैं, जो मनुष्य को मुख्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निर्मित हुए हैं”।
उपरोक्त परिभाषा में आपने अनेक समाजशास्त्रीय विद्वानों के विचार तथा उनके कथन को स्पष्ट रूप से पढा, अतः इन सभी विद्वानों के परिभाषा ओं को पढ़ने के पश्चात सरल शब्दों में हम आपको बताने की “संस्था एक प्रकार का ऐसा कानून व्यवस्था है जिसके अंतर्गत प्रत्येक व्यक्तियों के विचार संस्कृति और कार्यों को सम्मिलित किया जाता है इनका प्रमुख उद्देश्य समाज में रहने वाले व्यक्तियों के अभीष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बनाया जाता है जो बहुत ही समुचित पूर्ण तथा सुदृढ़ होते हैं और यह काफी ज्यादा स्थाई होते हैं। यह हमारे समाज के अनेक प्रकार की बुराइयों और समाज के प्रतिकूल व्यवहार करने वाले विचारों को बड़ी ही सरलता से कंट्रोल कर सकते हैं”हैं और

संस्था का महत्व value of Sanstha

हम समाज में रहते हैं तथा समाज में प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग विचारों अलग-अलग संस्कृति में पला बढ़ा हुआ होता है। इस प्रकार से प्रत्येक व्यक्ति समाज में अलग-अलग महत्व और पद प्राप्त करता है। समाज में रहकर प्रत्येक व्यक्ति को एक दूसरे से आवश्यकता जरूर होती रहती है इसलिए इन सभी को नियंत्रित करने के लिए संस्था का गठन किया जाता है संस्था हमारे सामाजिक जीवन में एक विशिष्ट महत्त्व रखता है। अतः उन्हें महत्त्व को हम आपके समक्ष बहुत ही समुचित पूर्ण ढंग से बताने वाले हैं जिसे आप लोग ध्यान से पढ़ें मैं आप लोगों को संस्था के कौन-कौन से महत्व है इन को बड़ी ही सरल शब्दों में बताऊंगा जिससे बड़ी आसानी से आप लोगों को समझ में आ जाएगा।

1-संस्कृति का रक्षक Sanskriti ka rakshak

संस्था हमारे समाज के संस्कृति और सभ्यता को बनाए रखने का कार्य करती है। क्योंकि संस्थाओं के द्वारा संस्कृति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में ले जाने के लिए अनेक प्रकार के कानून और नियम पारित करती है जिसके द्वारा हमारी संस्कृति एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाती रहती है और संस्कृति की स्थिरता बनी हुई रहती है। इस प्रकार से पीढ़ी दर पीढ़ी जीवन पर्यंत हमारी संस्कृति की रक्षा होती रहती है।

2-सामाजिक विघटन को रोकने में सहायक samajik vighatan ko rokne mein sahayak

संस्था हमारे समाज में एक दूसरे के प्रति प्रेम भावना तथा जरूरतों को पूरा करने के लिए संगठित करने की एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा समाज में होने वाले दुर्व्यवहार जैसे अपराध शोषण स्त्रियों के प्रति गलत विचार इत्यादि तमाम अपराध जो समाज के विरुद्ध होते हैं और सामाजिक विघटन को बढ़ावा देते हैं। संस्था अपनी संगठित नियमों के अनुसार इन सभी अपराधों को रोकने में काफी ज्यादा सहायक होती है इसलिए विघटन की स्थिति कम से कम होते होने की संभावना होती है।इस प्रकार से स्वस्थ हमारे समाज में होने वाली सामाजिक विघटन को रोकने में हमारी काफी ज्यादा सहायता करती है।

3-आवश्यकताओं की पूर्ति avashyakta ki purti

समाज में रहकर हमें एक दूसरे की आवश्यकता अवश्य पढ़ती है इसलिए समाज में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्य के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए ताकि सामाजिक व्यवस्था बनी रहे और किसी भी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की परेशानी का सामना ना करना पड़े। इन सभी नियमों को नियंत्रित करने के लिए संस्था की स्थापना की जाती है जो अपने सुदृढ़ और समाज के अनुकूल होने वाले नियम और कानून को संस्था के रूप में समाज में लागू करती है जिसका पालन प्रत्येक व्यक्ति की जिम्मेदारी होती है अतः इन जिम्मेदारियों को प्रत्येक व्यक्ति को अवश्य उठाना पड़ता है क्योंकि यदि किसी व्यक्ति के पास घर बनाने का हुनर नहीं है परंतु पैसा है तो वह बड़ी ही आसानी से किसी मिस्त्री को पैसे देकर अपना घर बनवा सकता है इस प्रकार से दोनों व्यक्तियों की आवश्यकता की पूर्ति बड़ी ही आसानी से हो जाती है 

4-सामाजिक परिवर्तन में सहायक samajik Parivartan mein sahayak

समाज में कुछ नियम ऐसे भी होते हैं जो काफी लंबे समय तक चलते रहते हैं और उस नियम के अंतर्गत कार्य करते करते प्रत्येक व्यक्ति बोर हो जाता है और वह कुछ अलग करने की सोचने लगता है क्योंकि समाज में परिवर्तन होना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि समय अनुसार समाज के अनुकूल होने वाले नियमों को समाज में लागू करना संस्था का कार्य होता है इस प्रकार से संस्था के द्वारा समाज में परिवर्तन हो जाता है जिसके द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को कोई भी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता है और उनका जीवन सरल और आसान बनाने का कार्य संस्था करता है।

संस्था की विशेषताएं sanstha ki visheshtaen

समाज में रहकर हमें अनेक प्रकार के सामाजिक नियमों और कानूनों के नियंत्रण में रहकर अपना जीवन व्यतीत करना होता है। नियमों का उल्लंघन करने के परिणाम स्वरूप अनेक प्रकार के दंड को भुगतना पड़ता है जिन्हें समाज द्वारा पूर्ण मान्यता प्राप्त होता है। उसी प्रकार समाज में किसी विशिष्ट उद्देश्य या समान उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाए जाने वाले समूह समुदाय अथवा समिति को संचालित करने के लिए संस्था का निर्माण किया जाता है जो उस समुदाय या समिति को संचालित करने के लिए एक व्यवस्थित ढांचा है जो उस समय में रहने वाले प्रत्येक सदस्य के हितों को ध्यान में रखते हुए बनाया जाता है जिसके अंतर्गत संस्कृति तथा लोगों के विचारों का नियमन किया जाता है। इस प्रकार से समाज में संस्था की अपनी कई विशेषताएं होती हैं जो उसे सुदृढ़ और काफी ज्यादा मजबूत बनाने का कार्य करती है।

1-मजबूत ढांचा majbut dhancha

संस्था एक कानून और नियमों का मजबूत ढांचा होता है जिसके अंतर्गत अनेक प्रकार के नियम कानून जो समाज के और समुदाय के हितों के लिए बनाए जाते हैं। एक छात्र ज्यादा मजबूत खर्चा होता है जिसको खंडित करने की क्षमता समुदाय अथवा समिति में रहने वाले किसी भी सदस्य में नहीं होती है संस्था के नियमों और कानूनों में सिर्फ कुछ परिवर्तन किया जा सकता है यदि अगर कोई नियम या कानून समाज अथवा समुदाय को नुकसान पहुंचाने का कार्य करता है ऐसी स्थिति में उस नियम को बदलने की अनुमति संस्था के अंतर्गत दी जाती है।

2-उद्देश्यों की पूर्ति uddeshy ki purti

संस्था का निर्माण समुदाय और समिति सामान्य और विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए बनाया जाता है इसलिए संस्थाओं का गठन करते समय प्रत्येक व्यक्तियों के उद्देश्यों की पूर्ति को ध्यान में रखते हुए नियम और कानूनों को बनाया जाता है जिसके द्वारा समाज के समुदाय तथा समिति के अंतर्गत रहने वाले किसी भी सदस्य को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परेशानी का सामना ना करना पड़े अतः इस परिस्थिति में संस्था अपने नियमों और कानूनों के अंतर्गत उद्देश्यों की पूर्ति करता है जिसका उदाहरण आपको मैं ऊपर के पोस्ट में बता चुका हूं और शायद आपने पढ़ा भी होगा।

3-सामूहिक स्वीकृति samuhik swikriti

जब किसी समूह अथवा समिति में संस्था को लागू किया जाता है उनमें सभी सदस्यों की सामान्य और विशिष्ट उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए संस्था का निर्माण किया जाता है इसलिए समूह में कार्य करने वाले प्रत्येक व्यक्तियों की पूर्ण स्वीकृति होने के पश्चात इन संस्थाओं को लागू किया जाता है। इसलिए संस्थाओं को पूर्ण रूप से सामूहिक स्वीकृति तथा अनुमति प्राप्त होती है।

4-प्रतीक prateek

प्रत्येक संस्था का अपना अपना एक प्रतीक होता है जिससे अंग्रेजी में लोगों को भी कहा जाता है आपने देखा होगा कि इंडियन बैंक का प्रतीक किस तरह का होता है पंजाब नेशनल बैंक का प्रतीक किस तरह से होता है हीरो की कंपनी का प्रतीक किस तरह का होता है इस प्रकार से प्रत्येक समुदाय अथवा समिति का अपना एक प्रतीक होता है क्योंकि हमारे समाज में अनेक प्रकार के समुदाय और समिति पाए जाते हैं जिनमें अनेक संस्थाएं होती हैं इसलिए प्रत्येक संस्थाओं का अपना अपना प्रतीक होता है। संस्थाओं के प्रतीक भौतिक तथा भौतिक नहीं हो सकते हैं। जैसे विवाह का प्रतीक मंगलसूत्र होता है। परिवार का प्रतीक उसका खानदान का पूर्वज होता है। इस प्रकार से प्रत्येक संस्थाओं का अपना एक प्रतीक होता है जिनके द्वारा उनके सदस्य अपने संस्थाओं की पहचान कर पाते हैं।

5-संस्थाएं अस्थाई होती हैं sansthayen sthai hoti hai

संस्थाएं हमारे समाज में काफी दिनों तक स्थाई रहती हैं। क्योंकि इनमें समुदाय में कार्य करने वाले प्रत्येक सदस्य की जरूरतों और हितों का ध्यान रखा जाता है जिसके कारण यह संस्थाएं काफी ज्यादा टिकाऊ होती हैं। समय अनुसार इन के नियमों में बदलाव किया जाता है क्योंकि कुछ नियम ऐसे भी होते हैं जो समय के अनुसार वह समाज के अनुकूल होने के बाद प्रतिकूल नहीं हो सकते हैं जिसके कारण उन नियमों को परिवर्तित किया जाता है परंतु संस्थाओं का जो मजबूत ढांचा होता है उनमें कोई परिवर्तन नहीं होता है और वह पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहते हैं और हमारी संस्कृति को बरकरार रखते हैं।

निष्कर्ष conclusion

संपूर्ण पोस्ट पढ़ने के पश्चात यह निष्कर्ष निकलता है कि समाज में दो तरह की आवश्यकताएं होती हैं पहला विशिष्ट आवश्यकताएं दूसरा सामान्य आवश्यकताएं। समाज में रहते हुए हमें एक दूसरे की आवश्यकताओं की पूर्ति करना होता है इसलिए सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समुदाय की स्थापना की जाती है तथा विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए समिति की स्थापना की जाती है जिनके अंतर्गत कुछ ऐसे नियम बनाए जाते हैं। इन्हीं नियमों और कानूनों के ढांचा को संस्था कहा जाता है। जो समुदाय और समिति के लिए काफी ज्यादा मददगार होते हैं और उनको संचालित करने में काफी ज्यादा योगदान होता है यह संस्थाएं संस्कृति और सुरक्षा व्यवस्था को कायम रखने का कार्य करती है। संस्थान के द्वारा हमें समाज में अनेक प्रकार की मदद मिलती है और अनेक विशेषताएं हैं जो इसे पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करने में मदद करती हैं।

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