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mirabai ka jivan parichay मीराबाई का जीवन परिचय

mirabai ka jivan parichay मीराबाई का जीवन परिचय

दोस्तों हमारे वेबसाइट पर आप लोगों को बहुत-बहुत स्वागत है आज के पोस्ट में हम मीराबाई के संपूर्ण जीवन के बारे में विस्तृत वर्णन करने वाले हैं। मीराबाई भक्ति काव्य धारा की बहुत बड़ी कवियत्री मानी जाती हैं। मीराबाई कृष्ण भक्ति शाखा की महान कवियत्री है तथा हिंदी काव्य जगत में इनका एक प्रमुख स्थान है अतः आज हम मीराबाई के जीवन के विषय में संपूर्ण जानकारी देने वाले हैं ताकि आप लोगों मीराबाई के जीवन के अनेक पहलू के बारे में संपूर्ण जानकारी प्राप्त हो सके। मीराबाई एक राजघराने की कन्या थी तथा एक राजघराने में ही उनका विवाह भी हुआ था। अतः मीराबाई की जीवन की कहानी अत्यंत रहस्यमई और रोचक है इसलिए मीराबाई की जीवनी के बारे में जन्म और मृत्यु तक संपूर्ण जानकारी आपको इस पोस्ट में मिल जाएगी।

जन्म और जन्म स्थान janm aur janm sthan

मीराबाई कृष्ण भक्ति शाखा की महान कवयित्री हैं जिनका जन्म और जन्म स्थान के बारे में कोई प्रमाणिक जानकारी नहीं है परंतु यह कहा जाता है उनका जन्म एक राजघराने परिवार में हुआ था। मीराबाई का जन्म मेड़ता के राठौर वंश में राव दूदा जी के पुत्र रतन सिंह के घर में हुआ था अतः हमारे कहने का तात्पर्य है कि मीराबाई के पिता का नाम रतन सिंह था। तथा इनका जन्म सन् 1498 में कुकड़ी नामक स्थान को बताया जा रहा है परंतु यह पूर्णतया प्रमाणित नहीं है। मीराबाई राजघराने में होते हुए अनेक सुविधाओं को प्राप्त कर दी थी परंतु मीराबाई का मन बचपन से ही कृष्ण की भक्ति में रम गया था। वह बचपन से ही कृष्ण को अपना पति मानती थी। यह प्रमाण उनके पद के अनुसार दिखाई देता है-  मेरेे तो गिरधर गोपाल दूसरों न कोई। इस बात से यह प्रमाणित होता है कि मीरा बाई का राज्य से अथवा इस संसार से कोई लेना-देना नहीं था उनका जीवन सिर्फ कृष्ण की भक्ति के लिए ही हुआ था।

मीराबाई का विवाह Mirabai ka Vivah

धीरे-धीरे मीराबाई विवाह के लायक हो गई और उनका विवाह भी एक राजघराने में ही हुआ। मीराबाई का विवाह सन 1516 मैं 18 वर्ष की आयु में मेवाड़ के राजा राणा सांगा के पुत्र भोजराज के साथ हुआ। मीराबाई का जीवन राजनीतिक परेशानियों के बीच व्यतीत हुआ। परंतु मीराबाई राजघराने में होते हुए भी उनका मन भौतिक सुख सुविधाओं में बिल्कुल भी नहीं था। कुछ दिनों पश्चात उनके पति भोजराज की मृत्यु हो गई। उन दिनों अनेक प्रकार के कुप्रथा का प्रचलन था, उनको प्रथा में एक सती प्रथा का भी प्रचलन था इसलिए जब भोजराज की मृत्यु हुई तो सब लोग ने मीराबाई को सती होने के लिए प्रेरित किया परंतु मीराबाई ने सती होने से इनकार कर दिया क्योंकि वह श्री कृष्ण को अपना पति मानती थी। कुछ दिनों पश्चात सन 1927 में उनके पिता खानवा के युद्ध में राणा सांगा की तरफ से युद्ध करते हुए उनके पिता रतन सिंह की भी मृत्यु हो गई।

मीराबाई का विष पीना Mirabai ka vish pina

 मीराबाई बचपन से ही कृष्ण भक्ति में रमी हुई थी वै श्री कृष्ण को अपना पति मान चुकी थी। मीरा का जन्म एक राजघराने में होने के कारण उनका विवाह भी एक राजघराने परिवार में ही हुआ था। मीराबाई कृष्ण की भक्ति में ओतप्रोत होकर जहांं भी श्री कृष्ण का भजन और कीर्तन होते देखती थी वह घर से भागकर साधु संतों के साथ नाचती और गाती थी। यह बात एक राजघराने परिवार के लिए एक बहुत लज्जा का विषय था इसलिए इसकेे घरवालों ने मीराबाई पर अनेक प्रकार की पाबंदियां लगाई परंतु मीराबाई नहीं मानती थी जिसका वजह से राणा सांगा के परिवार वालों को बहुुत शर्मिंदा होना पड़ता था। अंत में जब कोई उपाय नहींं बचा तो राणा सांगा ने मीराबाई के लिए विश भिजवा दिया ताकि वह उपहास और  लज्जा से मुक्तति पा सके। लोगों ने जब जहर का कटोरा मीराबाई के हाथ में दिया उस समय मीराबाई कृष्ण भक्ति मेंंं पूर्ण तरह सेे खोई हुई थी और कृष्ण भक्ति में वे नाच रही थी। मीराबाई ने जहर का कटोरा हाथ मेंं लेकर कहा कि हे मुरली वाले यदि हमने आपकी भक्ति जी जाान कि है तोोो यह विष का प्याला अमृत का प्याला बन जाए। इस प्रकार सेेे कहते हुए मीराबाई ने संपूर्ण जहर कोो पी लिया और नाचने लगी। परंतु वह जहर मीराबाई को कोई हानि नहीं पहुंचा सका। यह दृश्य देखकर सभी लोग दंग रह गए और सभी से मेरा भाई को एक देवी के रूप में मानने लग गए।

मीराबाई की कृष्ण भक्ति Mirabai ki Krishna bhakti

मीराबाई का मन बचपन से ही कृष्ण भक्ति में लीन रहने लगा। परंतु घरवालों के पाबंदी के कारण वह साधु संतो के संग तथा भजन कीर्तन में चोरी चुपके ही जा पाती थी परंतु पति की मृत्यु के पश्चात तथा राणा सांगा और पति रतन सिंह की मृत्यु के पश्चात वह पूर्ण रुप से कृष्ण भक्ति में लीन रहने लग गई तथा द्वारिका चली गई और साधु संतो के संग रहकर उन्होंने अनेक रचनाएं किया। मीराबाई कृष्ण को पति के रूप में प्रेम करती थी। उन्होंने अपने एक पद्य में लिखा है पायो जी मैं तो राम रतन धन पायो। इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि मीराबाई पूर्ण रूप से भगवान कृष्ण को अपना पति मानती थी।

मीराबाई की रचनाएं Mirabai ki rachnaen

मीराबाई कृष्ण भक्ति में तल्लीन होकर अनेक रचनाएं की है उन्होंने अपनी रचनाओं में ब्रजभाषा खड़ी बोली था गुजराती भाषा का उपयोग किया है। इनकी रचनाओं में शृंगार रस अत्यधिक विशेषता है रसों का राजा भी कहा जाता है। संयोग श्रृंगार तथा वियोग श्रृंगार दोनों रसों का बड़ी ही सूक्ष्मता से वर्णन किया गया है। मीराबाई की कुछ रचनाएं निम्नलिखित है।
  • नरसी जी का मायरा
  • गीत गोविंद का टीका
  • राग गोविंद
  • राग सोरठ के पद
  • मीराबाई का मल्हार
  • राग बिहाग
  • पद
  • गरबा गीत

मीराबाई की भाषा शैली Mirabai ki Bhasha shaili

मीराबाई अपनी रचनाओं मैं कृष्ण के प्रति प्रेम का बहुत ही मार्मिक और अद्भुत चित्रण किया है जिसे पढ़ने से पाठक पूर्ण रूप से कृष्ण की भक्ति में खो जाता है। मीराबाई की रचनाएं ब्रजभाषा खड़ी बोली तथा गुजराती है इनमें पश्चिमी ब्रजभाषा का अधिकतम समावेश किया है जो बहुत ही सुंदर और मनोरम भाषा मानी जाती है।
मीराबाई का काव्य लिखने का मुख्य उद्देश्य सिर्फ श्री कृष्ण की भक्ति मात्र है। जिसके कारण उनकी कविताओं में श्री कृष्ण के प्रेम की बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया गया है। इन्होंने अपनी रचनाओं में श्रृंगार रस का विधिवत वर्णन किया है।
बसो मेरे नैनन में नंदलाल।
मोर मुकुट मकरा करत कुंडल अरुण तिलक दिए भाल।
मोहनी मूरत सांवली सूरत नैना बने विसाल।
आधार सुधा रस मुरली राजत उर बैजंती माल।
शूद्र घंटेका कट तट सोभित नूपुर सबद रसाल।
मीरा प्रभु संतन सुखदाई भगत बछल गोपाल।

मीराबाई की मृत्यु Mirabai ki mrutyu

मीराबाई की मृत्यु के विषय में लगभग सभी लोगों की यही राय है। मीराबाई द्वारिका में रहकर श्रीकृष्ण की भक्ति में पूर्ण रूप से लीन रहती थी। तथा लगभग 48 वर्ष की आयु में मीराबाई ने अपने प्राण त्याग दिए तथा भगवान श्री कृष्ण में समाहित हो गई। 
मीराबाई भगवान श्री कृष्ण का गुणगान करते हुए सन 1946 में द्वारिका में स्वर्ग लोक चली गई।

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